ऋणदायिनी बन गई है कभी विनय देने वाली शिक्षा

आलोक कुमार विद्या ददाति विनयम। संस्कृत के इस श्लोक को चरित्रार्थ करती हुई न जाने कितनी पीढियां विनय से झूमती रही। लेकिन आज यह मस्ती गुम है। विद्या विनय नहीं बल्कि ऋणदायिनी हो गई है। खास क्या आम शिक्षा भी इतनी महंगी हो गई है कि विद्यार्थी को ऋण के भंवर में डूबो रही है। लगभग सभी संस्थानिक शैक्षणिक संस्थान ऋणम लिवेत, धृतम पिवेत नहीं बल्कि ऋणम लिवेत, शिक्षा प्राप्तयेत वाली दुर्दशा का शिकार बना रही हैं। सरकारी शैक्षिक संस्थानों की गुणवत्ता दिन प्रतिदिन गिरती गई और उसकी नींव पर निजी शैक्षणिक संस्थानों का मकड़जाल पसरता गया। समय की सबसे बड़ी जरुरत शिक्षा की दशा औऱ दिशा पर गहन चिंतन की है। डॉ. राममनोहर लोहिया होते, तो निस्संदेह आज सबसे ज्यादा चिंता मंहगी और आमजन के पहुंच से दूर हुई शिक्षा व्यवस्था पर कर रहे होते। इतिहास है कि लोहिया ने कन्नौज से 1967 का लोकसभा चुनाव जीतकर समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी, उसके आधार में सबको शिक्षा का अधिकार दिलाना था। उनके अनुयायी अगर महान समाजवादी चिंतक के इलाज का खर्च जुटाने में सफल हुए होते और काश आज लोहिया जी होते, तो निस्संदेह वह ऋण के अंधकूप में धकेले जा रहे विद्यार्थियों को बचाने में लग गए होते। लोहिया होते, तो शिक्षा पर बजट का छह फीसदी खर्च करने की मांग अनसुनी बनी नहीं होती। वह कोई प्रभावी मुहिम खडी करते। हस्तक्षेप करते। बहस-मुहासिब करते। व्यवस्था को झंकझोरते, कोई नई राह निकालने की पहल करते जिससे उनकी तरह के किसी तेजस्वी बालक को शिक्षा से मरहूम नहीं होना पड़ता। गौरतलब है कि लोहिया जी जब ढाई साल के थे, तब माता पिता का देहावसान हो गया। वह बचपन से ही पढाई में तेज और अध्यापकों के प्रिय छात्र थे। लेकिन समाज के सरोकार भरे सोच के सहारे उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से लेकर जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय तक में शिक्षा हासिल की। आज भी उन जैसे तेज और अध्यापकों के प्रिय छात्रों की कमी नहीं है। लेकिन उन छात्रों को शिक्षा के लिए लोहिया जी जैसा मुक्त आकाश मिल पाए, यह असंभव बना है। लोहिया जी की परवरिश उनकी दादी और यशोदा सदृश सरयूदेई ने की। उन्होंने आज के अम्बेडकर नगर के टंडन पाठशाला में चौथी तक की पढाई की। आगे की पढाई के लिए विश्वेश्वरनाथ हाई स्कूल में दाखिला लिया। वहां से पास कर काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक जाकर दाखिला लेने और इंटर पास करने में कोई दिक्कत नहीं आई। वहां से सन् 1930 में स्नातक की पढाई करने सीधे जर्मनी पहुंच गए। बर्लिन से लौटते वक्त हिंदू अखबार में लेख लिखकर बटखर्च निकाला और आजादी की लड़ाई में उतर गए। उन जैसे किसी अनाथ के लिए बर्लिन जाकर स्नातक करने का विकल्प आज भी है। बल्कि मशहूर ऑक्सफोर्ड, हॉवर्ड, कैलिफोर्निया या येल विश्वविद्यालय से भी बेहतर परिवेश देने का दावा करने वाले देश के निजी विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थानों की भरमार है। लेकिन सरोकार कमी है। आज उस संवेदनशीलता की कमी है जिसमें शिक्षा की लालसा रखने वाले लोहिया जी जैसे किसी अनाथ छात्र की अंगुली पकड़ कोई नया लोहिया पैदा कर दे। इस पुनीत काम की इच्छा वाले किसी शख्स का छक्के छुड़ाने के लिए देश के नामी निजी शैक्षणिक संस्थानों की आसमान छूती फीस ही काफी है। शिक्षा को लेकर विकराल होते हालात का अंदाजा लगा सकते हैं कि बच्चों के मंहगी स्कूली शिक्षा से घबराकर नई पीढी अपना संतान पैदा करने तक से हिचकने लगी है। आज दाम्पत्य जीवन की सबसे बड़ी चुनौती संतान को समुचित शिक्षा दिलाना बना है। निजीकरण के दौर में इंसान इस कदर मलजूम और मजबूर हो गया है कि कोई प्रतिकार करने को राजी ही नहीं। बडे लोगों के बड़े चोचले होते हैं। नोएडा के शिव नाडर स्कूल का वाकया है। नर्सरी में पढने वाले बच्चे ने माता पिता के साथ घर लौटने से मना कर दिया। उसकी शिकायत थी कि वह हीन भावना का शिकार बन रहा है। क्योंकि उसके सहपाठियों के लिए शॉफर ड्रेवेन लिम्बोरिनी, ऑउडी औऱ मर्सीडिज गाड़ियां आती हैं जबकि छुट्टी के वक्त उसके माता-पिता उसे लेने देसी मारुति कार से चले आते हैं। इससे भविष्य का सहज अंदाज लगाया जा सकता है। इसपर न तो कोई सोचने के लिए तैयार है, न ही कहीं से कोई पहल होती नजर आ रही है। बस भेड़ चाल की तरह हम खाई में गिरे जा रहे हैं। आज जिस तरह के विकट हालात हैं, उसमें फीस का विरोध करने वाले जेएनयू के छात्र शहरी नक्सली में शुमार कर दिया जाता हैं। आईआईटी,जेएनयू,वीएचयू से लेकर जाधवपुर विश्वविद्यालय तक की व्यवस्था आखिरी सांसें गिन रही है। उनके फीस सामान्य क्यों हैं, इसपर बहस चल पड़ी है। नेतरहाट, नवोदय विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, जिला स्कूल और राज हाईस्कूल में बच्चों की पढाई की क्या व्यवस्था रही है। उसकी कितनी जरुरत है, यह सरकार के चिंतन से दूर हुआ जा रहा है। नब्बे के दशक में हमारी उम्र के लोग कॉलेज शुल्क के नाम पर 124 रुपए, हॉस्टल के लिए 327 रुपए और मेस चार्ज के नाम 500 रुपए फीस देकर सीधे यहां तक कैसे चले आए। यह उसी तरह असंभव प्रतीत हो रहा है जैसा कि लोहिया जी के लिए जर्मनी से डॉक्टरेट कर आना है। सोशल मीडिया के मंचों पर उनका जमकर उपहास होता है। एक तरह से हमारी चेतना गुम होती जा रही है। हम बिगड़ती दशा को बचाने के लिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। उसपर चर्चा तक स्वीकार नहीं। बहस तो दूर की बात है। ऐसा क्या हो गया है कि सब भेड़ चाल में चल पडे हैं। शिक्षा जैसी मौलिक जरुरत की दशा पर कोई चूं चपड़ नहीं कर रहा। बिना किसी चर्चा, बहस या विरोध के शिक्षा पूरी तरह से निजी हाथों में चला जा रहा है। पहाड़ से लुढके पत्थर की तरह व्यवसाय का रुप ले लिया है। निजी विश्वविद्यालय चलाना चोखा धंधा बना है। ब्रांडिंग के लिए दिखावे के तौर पर उनमें आपसी प्रतिस्पर्धा कराई जाती है। मीडिया स्पांसर के जरिए वो अपनी रेटिंग तय करवाते है। मकसद एकमेव होता है, रेटिंग के आधार पर मनमानी शुल्क वृद्धि की जा सके। एकओर जहां निजी विश्वविद्याउसी मुताबिक विश्वविद्यालय या निजी स्कूलों का सरकारी विश्वविद्यालय आंदोलनरत हैं। निजी विश्वविद्यालयों में कोई चूं चपड़ नहीं है। जेएनयू में फीस बढोत्तरी पर हंगामा हुआ। वहां क्या पढाया जा रहा है। पढाई की शुल्क कैसे वसूली जा रही है। आंदोलन सिर पर है। ऐसे में सोचने की बात है कि अगर राममनोहर लोहिया होते,तो क्या करते ? लोहिया गांधी के अनन्य भक्त थे। दोनों में शायद ही कभी कोई टकराव हुआ है। लोहिया टकराव के उपासक रहे। गांधी के निधन के बाद गांधी की सोच को दिशा देने में अहम् भूमिका निभाई। लोहिया वह शौर्य बने, जिसने लीक से भटकते गांधी के चेले चमटों को ठोक ठठाकर सांचने का जतन किया। उसमें कई तरह से सफल रहे। समाजवादियों में गांधी के प्रति अगर आस्था है, तो वह लोहिया की देन है। लोहिया के आज जितने भी चेले हैं, वह गांधी के प्रति उच्चभाव रखते हैं। लोहिया पाठ्य नहीं बल्कि पाठ्यक्रम हैं। जिनकी उपयोगिता हर कालखंड में है। यह पाठ्यक्रम समाज को बाचाल सत्ता प्रतिष्ठान को सम्हालने की दिशा में बढ़ निकलने का साहस देता है। लड़ने की समाज म जीजिविषा पैदा करता है।

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