ये लेख दैनिक भास्कर के लिए है और 21 अगस्त के अंक में प्रकाशित है

समाजिक क्रांति ही एकमात्र निदान है नक्सलवाद का
-आलोक कुमार
नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती बताकर बार बार ललाट पर चिंता की लकीरें उभारने वाले गृह मंत्री पी चिंदबरम को साफ समझ लेना चाहिए कि नक्सलवाद का निदान ना तो रमन सिंह के ‘सलवा जुडुम’ में है और ना ही रोजगार गारंटी योजना ‘नरेगा’ में। हाल के दिनों में गृहमंत्री ने जब भी नक्सलवाद का खात्मे की रणनीति का हवाला दिया है,तो उनके चेहरे पर समाधान ढूंढ लेने का अजीब सा दंभ नजर आया है। ये दंभ ‘नरेगा’ को नक्सलवाद की काट के तौर पर पेश करने या समझ विकसित कर लेने का है। नक्सल प्रभावित इलाकों से नरेगा को लेकर जो रिपोर्ट आ रही है उसे आंकते हुए साफ कहा जा सकता है कि नरेगा समाधान नही है। और ये समझ सरकार को भारी पड़ सकती है।
दरअसल नक्सलवाद से निपटने की रणनीति तमिलनाडु की मानसिक पृष्ठभूमि से भी नही निकल सकती। ऐसा इसलिए कि तमिलनाडु में नक्सलवाद फूलने फलने ना पाए इसका इंतजाम पेरियार स्वामी ने बीते शताब्दी की शुरूआत में ही कर दिया था। पेरियार स्वामी ने समाजिक क्रांति की जिस बीज को तमिलनाडु में वृक्ष बना दिया वो बीज भारत के कई हिस्सों में आज भी ठीक से अंकुरित तक नहीं हो पाया है। बाबा साहेब अंबेडकर और कांशीराम के इरादे आज भी कागजी शगूफा बना हुआ है।
वीपी सिंह के मंडल कमीशन ने समाजिक परिवर्तन की जो पहल 1989 में की वो काम पेरियार स्वामी के दबाब में अंग्रेजों ने मद्रास में 1912 में ही कर दिया था। इसलिए चिदम्बरम साहब अगर तमिलनाडु की पृष्ठभूमि की सोच रखकर नक्सलवाद का समाधान तलाश रहे हैं,तो ये उनकी नादानी है। ये उसी किस्म की नासमझी है जिस तरह चिदम्बरम बेबाकी के साथ संसद में कह जाते हैं कि नक्सलवाद ने गैर कांग्रेसशासित राज्यों में ही पैर पसारा है। ऐसा कहते वक्त वो सिरे से भूल जाते हैं कि भारत में नक्सलवाद के जनक चारू मजुमदार ने माओवाद का भारतीय संदर्भ में पहला प्रयोग कांग्रेस की जमीन पर किया था। भारत में माओवाद का नाम नक्सलवाद पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में पहले प्रयोग के कारण हुआ। चारू मजुमदार भले ही बूढे होकर अपने साथी कानू सान्याल की तरह अब किनारे बैठ गए हों लेकिन नक्सलबाड़ी का उनका प्रयोग राजनीतिक तौर पर इस कदर सफल रहा कि कांग्रेस को पैतींस सालों से पश्चिम बंगाल की सत्ता में लौटने की बाट जोहनी पड़ रही है। इंतजार में बूढी हो गई कांग्रेस ने हारकर युवा तुर्क महिला नेत्री ममता बनर्जी का आसरा लिया है।

खैर,चारू मजुमदार औऱ कानु सन्याल की कहानी बीते जमाने की है। चालीस साल से ज्यादा पुरानी है। कहानी के नए पात्र कामेश्वर राव और कामेश्वर बैठा जैसे लोग हैं। कामेश्वर राव जैसा शख्सीयत तमाम सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलते हुए लालगढ़ पर कब्जा जमा लेता है.तो कामेश्वर बैठा जेल की सीखचों में बंद रहकर दलगत राजनीतिक जोड़तोड़ पर टिकी मौजूदा व्यवस्था की पोल खोलता है और पार्टी दर पार्टी बदलते हुए संसद तक पहुंचने का सफर तय कर लेता है। खुंखार एरिया कमांडर के तौर पर कुख्यात कामेश्वर बैठा की सफलता पढी जाने वाले बड़े साफ अक्षरों मे बता रहा है कि नक्सल प्रभावित इलाके से आने वाले दिनों में नक्सलियों की मदद के बिना सांसद या विधायक बन पाना नामुमकिन हो जाएगा। ये नक्सलियों के असरदार बनने की रणनीति का महत्वपूर्ण पड़ाव है। ये नक्सलवाद को समस्या समझने वालों और समाधान के लिए दिमाग मथने वालों की जानकारी में होना चाहिए कि धरातल पर नक्सली गणतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिनिधियों की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हैं।

बीते सात सालों से नक्सलवाद से निपट लेने की दावेदारी के साथ केंद्र में लगातार मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों की जिस तेजी से बैठकें हो रही हैं, उसी तेजी से जमीन पर नक्सल प्रभावित इलाके के दायरे में विस्तार हो रहा है। सात राज्यों में नक्सली असरदार भूमिका में हैं। प्रतिबंध और आतंकवादी घोषित के बावजूद इन राज्यों के 167 जिलों में सीपीआई(माओवादी) की यूनिटें खुल्लम खुल्ला काम कर रही हैं। हिंसा के प्रति नक्सलियों के खास आग्रह ने हालत विकराल बना रखा है। पुलिस बलों पर सीधे हमले और नक्सलियों के गुरिल्ला युद्ध से जानमाल और आर्थिक संसाधन का भयंकर नुकसान हो रहा है।
नक्सवाद की चपेट में फंसे राज्य आंध्र प्रदेश,छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड.बिहार और पश्चिम बंगाल पर गौर करें तो ये राज्य पूरी तरह से एक सपाट लाल पट्टी की तरह दिखते हैं। यानी यह साफ है कि एक राज्य के नक्सली दूसरे राज्य के नक्सलियों से सीधे संपर्क में रहकर विस्तार योजना को मूर्तरूप दे रहे हैं। राज्यों के प्रशासन के बीच सुरक्षा तंत्र बंटा पडा है लेकिन नक्सली एक हैं। नेपाल के माओवादियों से भारतीय नक्सलियों के दांत कटी रोटी के रिश्तों के सबूत बताते हैं कि नक्सल योजनाकारों का इरादा तिरूपति से पशुपतिनाथ तक लाल पट्टी बनाने का है। आगे नेपाल के माओवादियों पर चीन के असर बाकी कहानी कह रहा है। यानी खतरा ना सिर्फ खतरनाक है बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता का है।
केंद्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक देश का 40 प्रतिशत हिस्सा नक्सलियों के असर में आ गया है। वहां के विकास संसाधन यानी नरेगा और निर्माण जैसी योजनाओं के अमल पर नक्सलियों को सीधे हिस्सेदारी मिल रही है। मुख्यमंत्री रमन सिंह की स्वीकारोक्ति बेहद गंभीर है कि अकेले छत्तीसगढ से नक्सली तकरीबन 300 करोड़ रुपए लेवी के रूप में वसूल रहे हैं। यानी खनिज संपदा सपन्न आंध्र प्रदेश,उड़ीसा,झारखंड,बिहार औऱ पश्चिम बंगाल से वसूली जा रही लेवी को जोड़े तो नक्सली आर्थिक रूप से ताकतवर होते जा रहे हैं। देश के खनिज संपदा संपन्न इलाकों में नक्सलियों की खास रूचि को गंभीर साजिश का हिस्सा माना जा रहा है।
इन खतरों को देखते हुए जरुरी सवाल है कि फिर उपाय क्या है नक्सलवाद से निपटने का ? नक्सवाद से निपटने का आखिरी और पहला उपाय सामाजिक क्रांति है। वो क्रांति जिसकी जरूरत बिनोबा भावे ने भूदान आंदोलन के वक्त महसूस किया था। तेजी से बदलती दुनिया को देखकर बाबा भावे को साफ अहसास हो गया था कि अगर जमीन का ठीक से बंटवारा नहीं हुआ तो भारत में खुनी क्रांति के पैरोकारों का जमीन तैयार होने में देर नहीं लगेगी । नई शताब्दी के आरंभ से ही संत भावे की भविष्यवाणी सौ फीसदी खरी उतरती दिख रही है। बिनोवा भावे आखिरी वक्त तक इस बात से दुखी रहे कि भूमिहीनों के बीच बांटने के लिए जमींदार उनको जो जमीन दान में दे रहे थे वो बंजर और खेती लायक नहीं था। भूदान की जमीन लेकर जमीन लेना वाला खुद को पहले से ज्यादा ठगा महसूस कर रहा है। यानी कि निर्बल को सबल बनाने का आखिरी प्रयोग भी भारत में 1972-73 में फेल हो गया। और समाजिक चेतना के अभाव में तैयार हुई जमीन पर अब नक्सलवाद की फसल ने लहलहाना तेज कर दिया है।

नक्सलवाद को लेकर जमीनी सच्चाई है कि भारत में नक्सलवाद उन इलाकों में आसानी से पैठ बना ली है जहां समाजिक चेतना के अभाव में इंसानी सरोकार की जमीन खोखली हो चुकी है। सच तो यह है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में राजा राममोहन राय के बाद के दो सौ सालों में कोई समाजिक सुधार नहीं हुआ। जमीनी स्तर पर सिर्फ जमीन को लेकर ही नहीं जाति और वर्ण के नाम पर इंसानों के बीच खतरनाक भेदभाव है। सिर्फ जाति और कुल के नाम पर चिकना और खुर्रदरा जीवन का फर्क आज के युवाओं को समझ में नहीं आता। हालत में बदलाव और बेहतर जिंदगी की उम्मीद में वो नक्सलवाद की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसलिए नक्सलवाद से मुकाबले के लिए विकास के साथ समाजिक ज़ड़ता से मुक्ति के अभियान की सबसे ज्यादा जरूरत है। ये अभियान सरकारी तौर पर कन्या भ्रूण हत्या से निपटने के लिए धार्मिक और समाजिक नेताओं की मदद से छेड़े गए अभियान सरीखा हो सकता है। जिसमें धर्म गुरूओं और समाजिक प्रणेताओं के हवाले से बताना होगा कि इंसानों के बीच कोई भी भेदभाव पाप है। गांब गांव जाकर लोगों को समझाना होगा कि इंसान प्रकृति की अनुपम कृति है और इंसानों के बीच जाति, धर्म और पैसे के नाम पर जारी भेदभाव महापाप है। समाजिक अभियान से न सिर्फ छुआछुत के कारण डोम जाति के चोर को पत्थर फेंककर और उच्च जाति के चोर को थप्पड़ से मारने की व्यवस्था खत्म करने की जरूरत है बल्कि जातीय बंधन से पैदा हुई कुरीतियों को खत्म करने की आवश्यकता है। जाहिर तौर पर ये आसान नहीं है। इसके लिए रोडमैप की जरूरत है। अगर ऐसा नही हो सकता है,तो सिर्फ बल प्रयोग से नक्सलवाद से निपट लेने की कल्पना कर लेना बेमानी है। क्योंकि नक्सलवाद ना तो जम्मू-कश्मीर और पंजाब सरीखा धार्मिक आतंकवाद है और न ही पूर्वोत्तर भारत का जातीय और क्षेत्रीय आतंकवाद।
दरसल नक्सलवाद एक विचारधारा है जो अपने तरीके से गरीब,मजलूम और कमजोर को इंसाफ दिलाने की पैरवी करता है। यह जितना जमीन पर कोहराम मचाना नजर आता है उससे कहीं ज्यादा यह विचारधारा अपनी चपेट में आए इंसान को परेशान कर रहा होता है। चिदम्बरम साहब! नक्सलवाद को आतंकवाद घोषित करने के बजाए समस्या के निदान के लिए इस इंसानी परेशानी को पूरी संवेदना से समझना जरूरी है।
-----------------------------------------------------------

Comments

Popular posts from this blog

फिसलकर चीन चला जाएगा नेपाल (5/8/16)

पत्रकारिता की मर्सिया पाठ और पंकज पर पुण्य का ब्रजपात

प्रतीक यादव के जैविक पिता नहीं हैं नेताजी