फिसलकर चीन चला जाएगा नेपाल (5/8/16)
फिसलकर चीन जा रहा है नेपाल
आलोक कुमार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दो साल के शासन में जो सबसे ज्यादा अधोगति का शिकार हुआ है वह पडोसी देश नेपाल के साथ हमारा रिश्ता है। नेपाल शासन तंत्र में बैठे नेताओं से कटुता की वजह से साझा संस्कृति का देश नेपाल तेजी से सरककर प्रतिद्वंदी पड़ोसी देश चीन के पाले में होता चला जा रहा है। हम बेबस होकर टकटकी लगाए देख रहे हैं। बस बहाना है कि नेपाल घोर वामपंथ के दुराग्रही राजनीति का शिकार बन रहा है। वहां के माओवादी व मार्क्सवादी नेताओं को भारत के बजाय चीन से रिश्ते सुधारने में सहज महसूस कर रहे हैं। भारत के लिए ब्रिटिश राज के खिलाफ आजादी के आंदोलन में सक्रिय नेपाली कांग्रेस के नेता हाशिए पर हैं, इसलिए भारत की बात नेपाली सत्ता प्रतिष्ठान में सुनी नहीं जा रही है। यह तो बहाना है और इस बहाने को दूर करते हुए तत्काल ठोस पहल की जरूरत है।
कहीं न कहीं राजनयिक संबंध को दुरूस्त करने के प्रयासों में हमारी कोई कमी है। वरना ऐसी कोई वजह नहीं होनी चाहिए थी 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काठमांडू के बानेश्वर स्थित नेपाली संसद सभा में उठी “मोदी-मोदी” के नारों की गूंज इतनी जल्दी इस कदर निरर्थक साबित हो जाती। जिस पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान शंकर का आज भी पवित्र बागमती के जलाभिषेक करते वक्त स्थान का परिचय देते हुए “जम्बूद्वीपे भारत खंडे ” के नाम से संकल्प लिया हो, वह देश दुरूह विपदा भरी विराट हिमायलयी भौगोलिक सीमा के पार जाकर पड़ोसी चीन से दोस्ती करने में अगर सहज महसूस करने लगा है, तो यह सहज व सरल भौगोलिक सीमा पर मुक्त आवागमन की व्यवस्था वाला मित्र देश भारत के लिए अंदर झांकने का वक्त है। रोटी- बेटी के प्रगाढ़ रिश्ते वाले नेपाल के विमुख होने का सीधा मतलब है कि हमारे कूटनीतिक प्रयासों में कहीं न कहीं कोई भारी कमी है। जिसे या तो हम समझना नहीं चाहते या समझकर अनदेखा करने की भूल कर रहे हैं। नतीजा है कि हमारे कूटनीतिक प्रयास बेकार साबित हो रहे हैं और नेपाल फिसलकर चीन की ओर जा रहा है।
चीन से संबंधों की प्रगाढ़ता के एलान के साथ बीते पांच मई को जो घटना हुई है वह अभूतपूर्व है। दोनों मित्र देशों की कूटनीतिक के लिहाज से खतरनाक है। नेपाल ने झटके में दिल्ली से राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को वापस काठमांडू बुला लिया है। राजदूत को वापस बुलाने से पहले नेपाल ने अपने राष्ट्रपति विद्या भंडारी का भारत दौरा रद्द कर दिया था। यह दोनों की घटना बढ़ते फासले को दर्शाता है। भारत- नेपाल के साझा के संस्कृति के लिहाज से दिल्ली के नेपाली राजदूतावास का खाली होना नामुमकिन माना जाता रहा है। खासकर नेपाल की विशाल आबादी का भारत में रोजगार के जरिए भरण पोषण हो रहा है। नेपाली नागरिकों को भारतीयों के समान भारत में तमाम सुविधाएं मिली हुई हैं। भारत में कामकाजी नेपालियों के लिए घर से संपर्क साधने वाला सूत्र कमजोर पड़ गया है। नेपाल की ओर से राजदूत वापस बुलाने के गंभीर फैसले पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया है कि यह नेपाल की अंदरूनी राजनीति में आए विपल्व की वजह से हुआ है। इसका दोनों देशों की आपसी राजनयिक रिश्ते की मधुरता या कटुता से फिलहाल कोई लेना देना नहीं है। लेकिन यह जितनी सरलता से बताया जा रहा है उतना सरल है भी नहीं ।
ये सच है कि नेपाल में प्रधानमंत्री केपी ओली की गठबंधन सरकार आंतरिक राजनीति के दबाव में है। नेपाल की राजनीति में अगर कुछ सबसे अस्थिर है, तो वह वहां के प्रधानमंत्री की कुर्सी है। लोकतंत्र बहाली के बाद से बीते आठ साल में नेपाल के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लोगों का आना जाना तेजी से होता रहा है। प्रधानमंत्री ओली को बदले जाने की मांग मधेश आंदोलन के दिनों से चल रही है। मगर मई के शुरूआत में अचानक से इसे गति मिली। सरकार के सहयोगी माओवादियों ने ओली को हटाकर प्रचंड को फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाने का अंदरूनी फैसला कर लिया गया था। मगर जैसे तैसे यह फिलहाल टल गया है।
दिल्ली से राजदूत को बुलाकर जीवनदान पाए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सबसे पहला हैरत भरा काम किया है। दरसल भारत में नेपाल के निवर्तमान राजदूत दीपकुमार उपाध्याय नेपाली कांग्रेस के नेता रहे हैं। नेपाल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सुशील कोइराला सरकार के दिनों में राजदूत के तौर पर दिल्ली में नियुक्त किए गए थे। उसके बाद भी राष्ट्रपति पद पर नेपाली कांग्रेस के नेता डॉ, रामनाराय़ण यादव के रहने तक वह खुद के महफूज महसूस करते रहे थे। डॉ. यादव की जगह अब कामरेड विद्या भंडारी राष्ट्रपति हैं। नेपाल की मौजूदा राजनीति में नेपाली कांग्रेस के लोग पूरी तरह से किनारे लगाए जा चुके हैं। एक दीप कुमार उपाध्याय ही थे जो भारत में नेपाल के राजदूत के नाते मुख्यधारा की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहे थे। बीते मार्च में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का भारत दौरा सफल करवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। अब उनपर आरोप है कि वह प्रचंड के साथ मिलकर कामरेड ओली की सरकार गिराने की साजिश में शामिल थे।
गौरतलब है कि प्रगाढ़ आपसी संबंधों का हवाला देते हुए यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेता कामरेड ओली ने अपना साठवां जन्मदिन दिल्ली में मनाना पसंद किया था। लेकिन उनकी यह पसंद शायद सरकार को समर्थन दे रहे माओवादी नेताओं को नागवार गुजरी। कामरेड ओली को पदच्युत करने की व्यूहरचना की जाने लगी। गौरतलब है कि यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)नेतृत्व वाली खडग प्रसाद शर्मा ओली की सरकार माओवादियों के समर्थन पर टिकी है। अंदरूनी राजनीति के इस दबाव में ही प्रधानमंत्री चीन दौरे गए और दबाव के बहाने चीन के साथ उन कई समझौतों को अंजाम दे दिया जो भारत से संबंधों की प्रगाढ़ता को बलि बेदी पर चढ़ाता है।
भारत के संदर्भ में नेपाल मैं सत्तारूढ़ राजनीतिक गठबंधन को समझना चाहें, तो वहां गठबंधन सरकार का नेतृत्व पश्चिम बंगाल, केरल अथवा त्रिपुरा में शासन करती रही सत्तारूढ भारतीय काम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी कामरेड सीताराम यचुरी की पार्टी कर रही है। नेपाल में इसे यूएमएल नाम दिया गया है। इसने राजशाही के दिनों से ही नेपाली कांग्रेस को कड़ी चुनौती देने का काम किया है। यूएमएल के कामरेड ओली की सरकार को उग्र वामपंथी यानी सत्ता बंदूक के नोक से आती है जैसी सोच वाले पुष्प कमल दहाल प्रचंड यानी सीपीयूएन (माओवादी) के समर्थन से चल रही है। प्रचंड की पार्टी सीपीयूएन (माओवादी) अपने यहां बस्तर,गढचिरौली से लेकर बिहार व झारखंड के जंगलों में भूमिगत रहकर पुलिस व प्रशासन के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध कर रहे माओवादी लड़ाकों की पार्टी है। इससे नेपाल की गठबंधन से चल रही सरकार की सरकार की विसंगति का अनुमान लग गया होगा। इन विसंगतियों के बीच भारत से सौहार्द का खत्म होना एक लिहाज से लाजिमी है लेकिन राजनयिक रिश्ते का तकाजा है कि पड़ोसी मुल्क की सत्ता में काबिज पार्टी के साथ भारत के बेहतर संबंध होने चाहिए। वैसे ही बेहतर जिसके आधार पर भारत-नेपाल के बीच अटूट मैत्री संबंध बना रहा है।
भारत से बढते फासले का नतीजा है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के छह दिवसीय चीन यात्रा के दिनों में नेपाल के साथ भारत को खटकने वाले कई समझौते हुए हैं। समझौते के अमल में आते ही नेपाल की भारत पर निर्भरता खत्म होती जाएगी। सदियों से कायम प्रगाढ़ रिश्ते में खरोंच आएगी। समझौते के तहत नेपाल ने चीन से रिश्ते मजबूत किए। इसमें सबसे विचित्र बात है कि नेपाल अब एक हजार किलोमीटर दूर भारत के कोलकाता स्थित हल्दिया बंदरगाह के बजाय तीन हजार किलोमीटर दूर स्थित चीनी तिआनजिंन बंदरगाह से अपने जरूरी सामानों की आपूर्ति कराएगा। बिडंबना यह भी है कि नेपाल चीन के इस बंदरगाह का तुरंत इस्तेमाल नहीं कर सकता है क्योंकि चीनी बंदरगाह ऊंचाई पर है और नेपाल में आधारभूत ढ़ांचा उपलब्ध नहीं है। यह समझौता शायद मधेशी आंदोलन के चलते भारत से आने वाले नेपाल की व्यापारिक मार्गों को करीब छह माह तक बंद कर दिया गया था। जिससे नेपाल का जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है। इस नाकेबंदी की भविष्य में पुनरावृति होने की आशंका है। मधेशियों के भारतीय मूल के होने के कारण इस आंदोलन को भड़काने का आरोप नेपाल भारत पर लगाता रहा है।
इस अहम समझौते के अलावा अबाध गति से तिब्बत के रास्ते नेपाल से आवागमन सहज करने वाले रणनीतिक रेलमार्ग विकसित कर रहा है। चीन पहले से ही तिब्बती शहर शिगास्ते तक पहुंचा चुका है। यहां से नेपाल सीमा के गायरो तक रेल पहुंचाने की योजना बना चुका था। काठमांडू से दो सौ किलोमीटर दूर पोखरा में क्षेत्रीय हवाई अड्डा निर्माण के लिए नेपाल को 21.6 करोड़ डॉलर सस्ते ब्याज दर पर ऋण देगा। पचास सदस्यीय भारी भरकम प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन गए प्रधानमंत्री ओली ने चीन से मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। नेपाल में तेल व गैस की खोज करने पर चीन सहमत हुआ है। इसके लिए वह नेपाल को आर्थिक व तकनीकी मदद देने को तैयार है। चीन से संस्कृति, शिक्षा व पर्यटन जैसे मुद्दों पर समझौते हुए हैं। पारगमन व परिवहन समझौता किया है। इसके अंतर्गत चीन के बंदरगाहों का नेपाल इस्तेमाल कर पाएगा। इससे पेट्रोलियम आयात के लिए भारतीय बंदरगाह पर एकल निर्भरता खत्म हो जाएगी। इंधन आयात समझौते के अंतर्गत नेपाल के निजी क्षेत्र के उद्यमी चीन से इंधन आयात कर पाएंगे। इसके अलावा द्विपक्षीय ट्रेडमार्क पंजीकरण व सुरक्षा समझौता, मुक्त व्यापार समझौता, नेपाल में चीन बैंकों के शाखा शुरू करने व नेपाली बैंकों के चीन में शाखा खोलने संबंधी समझौते हुए है। भारत से बेरूख होकर चीन की ओर फिसलकर जा रहे नेपाल ने चीन के सिंचुआन प्रांत की राजधानी चेंगदू में नेपाल का वाणिज्य दूतावास खोलने का फैसला किया है।
अरसे से इन्हीं कूटनीतिक चालों के चलते काम्युनिस्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में लिया और नेपाल के हिंदू राष्ट्र होने के संवैधानिक प्रावधान को खत्म करके प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। अब प्रधानमंत्री कामरेड ओली से चीन के आसान दखल वाले समझौते करवाने के बाद उसे अमल में लाने के लिए चीन फिर से प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवाने की चाल में है। इन्ही चाल का नतीजा है कि चीन से समझौते कर लौटे प्रधानमंत्री ओली की सरकार को मई महीने के आरंभ में ही गिरा देने की माओवादियों ने व्यूहरचना कर ली थी। इस बावत सीपीएमएन के अध्यक्ष पुष्प दहाल कमल प्रखंड की अध्यक्षता में माओवादियों की महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक से उपजे तनाव और नेपाल की राजनीति में बढे अंदरूनी दबाव के फलितार्थ राष्ट्रपति विद्य़ा भंडारी की भारत यात्रा मुल्तवी कर दी गई। राष्ट्रपति के भारत दौरे को मुल्तवी करने के फैसले पर दिल्ली स्थित राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने नाराजगी जताई तो उनको वापस बुलाने का दो टुक फैसला कर लिया गया।
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