टीपू का बुझता शौर्य
“टीपू“ जो शौर्य दिखाए बिना अब शायद ही सुल्तान बन पाए (8 अगस्त 2016 को यूपी घटनाक्रम पर लिखा लेख)
आलोक कुमार
नई दिल्ली। मुलायम सिंह यादव का मुख्तार समाजवाद सामने है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के न-न के बावजूद बाहुबली मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय कर लिया गया। बात इतने भर तक होती तो बात ठीक थी लेकिन परिवार में मचा घमासान कहां विराम लेगा उसका अंदाज लगाना दिग्गज सियासी पंडितों के लिए मुश्किल हो रहा है। मुख्यमंत्री को पार्टी मामलों में दरकिनार करने का रुख समाजवादी पार्टी में बड़े विखराव की ओर संकेत कर रहा है लेकिन समाजवादी सुप्रीमो को मौजूदा दौरा का सबसे कुशाग्र नेता मानने वाले चमत्कार भरे उलट फेर की उम्मीद बांधे बैठे हैं।
मैसूर के यशस्वी शासक टीपू सुल्तान के शौर्य का समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह पर खास असर रहा। यही वजह रही कि बेटे अखिलेश की पुकार का नाम “टीपू” रखा गया। सीएम अखिलेश यादव को चाचा शिवपाल व रामगोपाल जैसे दिग्गज टीपू के नाम से ही जानते और पुकारते हैं। नाम के अनुरूप “टीपू” यशस्वी तो हुए और भारत के सबसे बड़े सूबे मुख्यमंत्री तक बन बैठे । लेकिन इनको फिलहाल सुल्तान सरीखा व्यवहार न तो पिता और न ही चाचा को पसंद आ रहा है। जब सुल्तान बनने का वक्त आया तो अचानक से पर कतरने का सिलसिला शुरु हो गया। आहत टीपू का मतलब भरा बयान है कि ऑपरेशन शिवपाल से पहले प्रदेश में समाजवादी पार्टी की स्थिति नंबर एक थी, अब पता नहीं कहां पहुंच गई है।
ऐसे में मुख्यमंत्री से सल्तनत की बहाली के लिए बड़े कदम उठाने की उम्मीद बता रही है कि सपा में घमासान का दूसरा दौर कभी भी शुरु हो सकता है। क्योंकि यश बहाली का रास्ता पराक्रम से बनता है। ऐसे में बाहर से शांत दिखने वाले अखिलेश पराक्रमी हैं या नहीं, यह फिलहाल तय होना बाकी है।
लेकिन टीपू सुल्तान और टीपू के जीवन में कुछ समानताएं हैं। उनमें एक कि दोनों का जीवन उतार चढ़ाव के हिचकोलों से भरा है। टीपू सुल्तान के साथ जो होना था वो हो गया लेकिन मुख्यमंत्री “टीपू” के साथ जो हो रहा है वह भविष्य में जब कभी “लोहिया के समाजवाद” और “मुलायम सिंह के परिवारवाद से भरे समाजवाद” में फर्क का नया अध्ययन है। हम वक्त के उस मोड़ पर खड़े हैं जहां समाजवादी राजनीति का दिलचस्प अध्याय पूरा नहीं हुआ है बल्कि लिखा जा रहा है।
इतिहास पुरुष टीपू सुल्तान की हालिया चर्चा विजय माल्या के प्रयास से हुई थी। ब्रिटेन में सुल्तान की “तलवार“ की नीलामी को उद्योगपति माल्या ने ललकारा था। ऊंची बोली लगाकर इतिहास में ब्रिटिश सल्तनत की चूलें हिला देने वाली सुल्तान के तलवार को भारतीय अजायबघर के हवाले कर दिया। इत्तेफाक है कि अब भगोड़े माल्या को भारतीय जांच एजेंसियों मुंह छिपाने के लिए उसी ब्रिटेन में शरण लेनी पड़ी है। मतलब टीपू सुल्तान का जीते जी उतार चढाव का दौर बदस्तूर जारी है। कमोवेश यही हालत यूपी के सीएम टीपू यानी अखिलेश यादव के जीवन में देखने को मिल रही है।
“टीपू” का तार्रूफ कराते हुए पिछले दिनों चाचा शिवपाल ने बताया, “नेताजी तो सियासत में व्यस्त रहते थे। नौ साल की उम्र से टीपू को पढ़ाने लिखाने की जिम्मेदारी मेरे पर थी। टीपू के विदेश जाकर पढ़ाई पूरी करने की जिम्मेदारी उठाई। इसलिए उससे वैमनस्य और इर्ष्या की बात झूठी है।“ लेकिन यूपी की सियासत में जो नजर आ रहा है वह चचा का त्याग तो कतई नहीं कहा जा सकता है।
हालांकि विदेश से लौटे भतीजे को सियासत में चमकाने की जिम्मेदारी चचेरे चाचा रामगोपाल ने उठाई। टीपू के लिए रातोंरात प्रदेश पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी भाई शिवपाल से लेकर सन्न करवा दिया। इससे फायदा हुआ कि 2012 में सपा के युवा नेतृत्व के प्रति बढ़ी उम्मीद से यूपी की जनता ने बहन जी को बाय- बाय कर दिया। नेताजी की “आंख-नाक-कान” बने अमर सिंह को चचा रामगोपाल ने पार्टी से निकाला जाना सुनिश्चित करवाया था।
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