सबसे बुरा है भूख से तडपकर मर जाना (4/4/16)

-आलोक कुमार इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के उतरार्द्ध में भारत की राजनीति का बखान करते हुए बडे दंभ से कहा जाता है कि हम जाति-धर्म के विषाद से उबार गए हैं। सेटलाइट युग में प्रवेश कर गए हैं। ब्रह्मांड को भेदते हुए चंद्रयान-2 भेजने वाले हैं। सबसे सस्ती लागत में उपग्रह प्रक्षेपित कर रहे हैं, अब जनता समझदार हो गई है। विकास की राजनीति होने लगी है। अब मुकम्मल विकास का खाका पेश किए बिना कोई चुनाव जीत नहीं सकता। वितर्कों के साथ इस विकास की दुदुंभि जोर से बजाई जा रही है कि हम दुनिया में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन करते हैं। सर्वाधिक अन्न उत्पादित करने वाले देशों में शामिल हैं। मगर इस शोर में खाली पेट भूखे मरने वालों की चीत्कार कम नहीं हो रही। पेट में अन्न का दाना नहीं पहुंचने की वजह से तड़पकर मर रहे इंसान की दरिद्रता उसके जाति धर्म या कुल पूछकर नहीं आ रही बल्कि भूख की तड़प कथित विकास के क्रूर संसाधनों के असमान वितरण की जीती जागती मिसाल है। दलित दलदल के बहस में फंसाकर भूख के मुद्दे से भटका देने वाले रोहित बेमुला की आत्महत्या हो या हिंसक संप्रदायिक सोच की वजह से हुई अखलाक की नृशंस हत्या हो या फिर भारत माता की जय के नारे को लेकर उपजा खटराग, इन सबसे बावजूद शर्मिंदा करने वाला सवाल जिंदा है कि जयकारे के बावजूद भूख से इंसान क्यों मर रहा है ? भूख की मार किन्ही उपाध्याय जी या शेख अथवा मुंसिफ साहब की घर को पहचानकर नहीं छोड़ती। जाति संप्रदाय में बंटे समाज पर समान रूप से कोड़े क्यों बरसा रही है ? जब कोई भूख से मर जाता है, तो प्रशासन आगे कोई भूख से न मरे इसका इंतजाम करने के बजाय़ डाक्टरी सर्टिफिकेट में मौत की वजह कुपोषण बताकर सो जाती है। इस संवेदनहीनता के इलाज के लिए कोई आंदोलन या बवंडर क्यों नहीं उठता ? भूख से मरने के मार्मिक दृश्य को देखने के लिए हमें सुदूर अफ्रीकी देशों में जाने की जरूरत नहीं बल्कि लाज और हया की आंखों से देखेंगे तो हमें कहीं भी भूख से बिलखते बच्चों का दीदार हो जाएगा। खाना नहीं खा पाने की वजह से मरियल पड़ा इंसान नजर आ जाएगा। रिकार्ड की बात करें,तो भारत के कई ऐसे इलाके हैं जहां लोग भूख से बिलख रहे हैं। बच्चे भूखे पेट सो रहे हैं। अन्न नसीब नहीं होने की वजह से मर रहे हैं। दृष्टांत की कमी नहीं है। दिनांक 11 मार्च 2016, स्थान- उन्नाव, उप्र, गांव-कुसुंभी, नाम- श्रीपाल, उम्र 72 साल की मौत भूख से हो गई। वह तीन दिनों से कच्चा आलू खा रहा था। अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था। तीन महीने से सरकारी राशन के दुकान से अन्न नहीं मिला था। वह बीपीएल कार्डधारक था लेकिन 2013 से उसके मनरेगा से मिलने वाले धन वाले बैंक एकाउंट में कोई इंट्री नहीं हुई। श्रीपाल की मौत तब हुई जब प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने खाद्य सुरक्षा योजना लागू कर रखा है। इस योजना में कागजों पर प्रत्येक महीने 90 प्रतिशत ग्रामीणों को पांच किलो अनाज देने का इंतजाम है। दिनांक 27 मार्च 2016 स्थान-शेखपुरा, बिहार, महादलित समुदाय के वृद्ध जागो मांझी ने भूख से तड़प कर दम तोड़ दिया। शेखपुरा जिला मुख्यालय से लगभग 60 साल के दूर वृद्द जागो मांझी के पास कई दिनों से खाने को कुछ नहीं था। जागो मांझी की मौत के बाद उसकी लाश उठाने वाला भी कोई नहीं था। महादलित की राजनीति से चमके नीतीश कुमार की प्रशासन अब हकलाते हुए कुपोषण को मौत की वजह बता रही है। अफसोस कि हमारी व्यवस्था का यह दोष राष्ट्रीय बहस का मुद्दा नहीं बन रहा। जबकि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन की रिपोर्ट में हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हर साल लज्जित होते रहे हैं। भूख से मौत की ऐसी ही रिपोर्ट 27 नवंबर 2015 को इलाहाबाद से प्रकाशित अखबारों की सुर्खियां बनीं। बारा तहसील के गीज पहाड़ी गांव में पैंतीस साल के तोताराम ऊर्फ समरजीत और सात साल की बेटी राधा की मौत भूख से हो गई। प्रशासन के हवाले से आई डाक्टरी रिपोर्ट में कहा गया कि मौत बुखार की वजह से हुई। जबकि विकलांग पत्नी और छह बच्चों का लालन पालन करने वाले तोताराम के घर में खाली बरतन और सूना चूल्हे बता रहे थे कि बिमारी की वजह से उसके घर में दवा और खाना दोनों नहीं मिल रहा था। बीते 25 अक्टूबर को छत्तीसगढ के जशपुर से भूख से मौत की खबर आई। विपक्ष के नेता भूपेश पटेल ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलकर बताया कि विलुप्तप्राय कोरवा जनजाति के लंबूराम की भूख से मौत हो गई। कोरवा जनजाति विशेष संरक्षित जाति में शामिल है। संरक्षित जनजातियों को भारत के राष्ट्रपति से सीधा संरक्षण हासिल है। साठ साल के लंबूराम के घर चुल्हा चक्की बंद था। लंबू राम के गांव का दौरा करने वाले कांग्रेस नेताओं ने पाया कि गांव के दस घरों में से किसी में अन्न उपलब्ध नहीं था। कागजी तौर पर ये परिवार प्रतिमाह कम से कम 35 किलो चावल पाने का हकदार है। पहाड़ी कोरवा आदिवासी जंगलों में कंदमूल खाकर जीवन बसर करते रहे हैं। भूख को लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की हालत सबसे बुरी गत है। योगेन्द्र यादव के स्वराज अभियान का सर्वेक्षण झकझोरने वाला है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में सात जिलों में बीते दशहरा से दिवाली के बीच किए गए सर्वेक्षण में सामने आया है कि यहां के 38 फीसदी गांवों में भूख से एक मौत हुई है। जिस गाय को बचाने के लिए देश में बवाल हो रहा है, बुंदलेखंड के 41 फीसदी लोग गरीबी और भुखमरी के चलते अपनी गायों को छोड़ रहे हैं। स्वराज अभियान की ओर से बुंदेलखंड के सात जिलों की 27 तहसीलों के 108 गांवों में यह सर्वेक्षण किया गया है। इस सर्वेक्षण में देश के जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, रितीका खेड़ा, संजय सिंह (परमार्थ, औरई) और योगेंद्र यादव समेत कई स्वयं सेवी शामिल थे। सर्वेक्षण में सामने आया है कि बुंदेलखंड में लगातार तीसरे साल से चल रहा सूखा अब अकाल की स्थिति में है। बीते आठ महीनों में यहां के 53 फीसदी गरीब परिवारों ने दाल नहीं खाई है। 69 फीसदी ने दूध नहीं पिया है। हर पांचवा परिवार कम से कम एक दिन भूखा सोया है। 38 फीसदी गांव से इस होली के बाद भूख से मौत की खबरें आई हैं। होली के बाद 60 फीसदी परिवारों में गेंहूं, चावल, मोटे अनाज या आलू की जगह फिकारा की रोटी खाई है। फिकारा एक प्रकार की स्थानीय घास है। होली से लेकर अभी तक 40 फीसदी परिवारों ने अपने पशु बेच दिए जबकि 27 फीसदी लोगों ने अपनी जमीन बेच दी या उसे गिरवी रखा। चारे की कमी के कारण 36 फीसदी गांव में 100 से ज्यादा गाय-भैंस छोड़ने को मजबूर हुए। परिवार में बच्चों और बूढ़ों को महीने में सिर्फ छह दिन दूध नसीब हुआ और चार दिन दाल। गरीब परिवारों में आधे से ज्यादा ने एक दिन भी दाल नहीं खाई थी और 69 फीसदी ने दूध नहीं पिया था। गरीब परिवारों में 19 फीसदी को एक महीने में कम से कम एक दिन भूखा सोना पड़ा। यही नहीं सामान्य परिवारों में भी दाल और दूध का उपयोग कम हो गया है। यहां के 79 फीसदी परिवारों ने बीते कुछ महीनों में कभी न कभी रोटी या चावल सिर्फ नमक के साथ खाया है। 17 फीसदी परिवार घास की रोटी (फिकारा) खाने पर मजबूर हुए। भूख से बिलख रहे भारत में मिसालों की कमी नहीं है। भूख की मार से निपटने में तमिलनाडु का अम्मा कैंटीन लोकप्रिय साबित हो रहा है। हरे भरे अकाल के कालाहांडी वाले इलाके की वजह से बदनाम ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार ने तमिलनाडु के उन नौकरशाहों को सलाहकार नियुक्त किया है ताकि ओडिशा की आबादी के लिए भोजन का अधियाकार सुनिश्चित किया जाए। संयुक्त राष्ट्र की “विश्व में खाद्य सुरक्षा की स्थिति 2015” रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया में भूखों की तादाद में कमी आई है लेकिन भारत भूखों का सिरमौर बना हुआ है। भूख की स्थिति पर सालाना अंतर्राष्ट्रीय मर्सिया पढने वाली रिपोर्ट हर साल मई महीने में आती है। कई सालों से इसमें बेबाकी से जिक्र हुआ करता है कि भारत में भूख से मरने वालों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। बीते साल विश्व में खाद्य असुरक्षा की स्थिति पर आई रिपोर्ट में भारत की शर्मसार करने वाली छवि पेश की गई है। भारत में 19 करोड़ चालीस लाख इंसान भूखे हैं। उनको सम्मानजनक तरीके से जीने अथवा स्वस्थ रहने के लिए अन्न का दाना मय्यसर नहीं है। जाहिर तौर पर आबादी बढ़ने के साथ भूख से तडपने वालों की आबादी भी निरंतर बढ रही है। इस सच को कबूलने के बजाय संयुक्त राष्ट्र के रिपोर्ट आने के तुरंत बाद भारत सरकार के मंत्री भूख पर विजय पाने के लिए जमीनी प्रयासों का जिक्र करने बजाय प्रेस कांफ्रेस कर रिपोर्ट को पूर्वाग्रह से ग्रसित बता दिया करते हैं। जबकि हालिया सच्चाई है कि सीधे गरीब के हाथ नकद पहुंचा देने वाली मनरेगा जैसी योजना भूख की मार से निपटने में कारगर साबित हो रही हैं। भूख पर आने वाले इस वैश्विक रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 1990-92 में दुनिया में एक अरब लोग भूखे थे। यह संख्या 2014-15 में घट कर 79.50 करोड़ हो गई। चीन और पूर्वी एशिया के दूसरे देशों में स्थिति में ज़्यादा सुधार हुआ है। चीन ने इस मामले मे भारत से बेहतर काम किया है। वहां 1990-92 में भूखे लोगों की संख्या 28 करोड़ 90 लाख थी, जो 2014-15 में घट कर 13 करोड़ 38 लाख रह गई है। संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट में यह भी कहा है कि भूख से इंसान को बचाने के लिए तय किए गए सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करने के मामले में 129 में से 72 देशों को कामयाबी मिली है। इसके अलावा 29 देशों ने 1996 में हुए विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन के लक्ष्यों को हासिल कर लिया है। भारत में भी भारत में भी भूखों की तादाद में कमी आई है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक़, 1990 में भारत में भूखों की संख्या 21 करोड़ 10 लाख थी जो बीते साल घटकर 19 करोड़ चालीस लाख रह गई थी।

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