कुनबे की लड़ाई के केंद्र में हैं अमर सिंह (10/24/16)

कुनबे की लड़ाई के केंद्र में हैं अमर सिंह आलोक कुमार नई दिल्ली। अमर सिंह फिर चर्चा में हैं। इस बार “अंकल” से भतीजा नाराज है, तो सुप्रीमो मुलायम सिंह कह रहे हैं कि अमर सिंह “मेरा भाई” है। ऐसे में अमर सिंह को लेकर छिड़ी लड़ाई का अंत आपसी मिलन से होता नजर नहीं आ रहा है। हालात साफ है कि या तो सपा सुप्रीमो अमर सिंह को भाई न मानें और 2010 की तरह जयप्रदा के साथ “दूध की मक्खी” समझकर निकाल फेंके। या फिर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आत्मसमर्पण की मुद्रा अख्तियार कर लें और मुख्तार अंसारी समेत अमर सिंह को असली “अंकल” मान लें। दोनों ही बात होती नजर नहीं आती। इसलिए कह रहे हैं कि सपा के परिवारवाद को अमर सिंह को जिसकी नजर लग गई है। मिसालें हैं कि अमर सिंह की जिस किसी को नजर लगी है उसका अंतत हश्र यही होता है। मिसाल के तौर पर अंबानी परिवार के दो भाईयों के विखराव की कहानी है, तो सहारा के अंतकाल का करीब आने की दुहाई। अमिताभ बच्चन के परिवार में छाई अशांति को “अथ अमर कथा” से जोड़कर सुनाया जाता है। राज्यसभा सांसद अमर सिंह को लेकर ताजा मिसाल यादव कुनबे की कुटील लड़ाई बनी है। समाजवादी पार्टी में बिखराव के करीब को देखकर यह कहने वालों की लंबी फौज है जो इसमें सिर्फ और सिर्फ अंकल अमर सिंह की गहरी चाल देखते है। इस जंग की शुरुआत ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उस ऐलानिया उदघोष से हुई थी कि वह अमर सिंह को अब “अंकल” नहीं कहेंगे। अंकल नहीं कहने के भेद को खोलते हुए उन्होंने आज लखनऊ में साफ किया कि अमर सिंह ने उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतार फेंकने का ख्वाब पाल रखा है। इसके लिए वह व्यूह रचना में व्यस्त हैं। हालांकि अब अंकल नहीं कहूंगा के जबाव से होशियार हुए अमर सिंह की सधी प्रतिक्रिया थी कि अखिलेश उनके पुत्र के समान है। लिहाजा उनको यकीन नहीं हो रहा है कि मुख्यमंत्री सार्वजनिक तौर पर उनके बारे में ऐसी राय रखेगा। आज जब लखनऊ के समाजवादी पार्टी कार्यालय में चाचा- भतीजे के बीच तलवारें तनी थी, सपा सुप्रीमो अंपायर के तौर पर पक्षपात का आरोप झेल रहे तो फिर अंकल अमर सिंह चर्चा में थे। मंच से मुख्यमंत्री अखिलेश ने रुंधे गले अमर सिंह के नाम आरोपों की झड़ी लगा दी। जबकि इलाज के नाम पर अमर सिंह लखनऊ से सात हजार किलोमीटर दूर लंदन के अस्पताल में दाखिल होने की बात कर रहे थे। दरसल 60 साल के अमर सिंह का व्यक्तित्व ही ऐसा है कि उनकी मौजूदगी भर से विवाद की खाई गहरी हो जाती है। मुख्यरमंत्री अखिलेश यादव खुलकर अमर सिंह की पार्टी में वापसी का विरोध कर रहे हैं जबकि मुलायम और शिवपाल उनके साथ खड़े हुए हैं। राजनीति में अमर सिंह की अपरिहार्यता हमेशा बनी रही है। अमर सिंह के विरोधी उन्हेंा बेहद महत्वाककांक्षी और साजिश रचने वाला मानते हैं तो उनके समर्थक उन्हें फंड रेजर और क्रा‍इसिस मैनेजमेंट का माहिर बताते हैं। शायद यही कारण रहा कि प्रमुख मुस्लिम चेहरे माने जाने वाले आजम खान के पुरजोर विरोध के बावजूद अमर सिंह की पार्टी में न सिर्फ ससम्मामन वापसी हुई। राज्यसभा भेजा गया बल्कि उन्हेंे राष्रीके य महासचिव पद से नवाज दिया गया। कारोबारी अमर सिंह के बारे में कहा जाता है कि उनके संबंध सभी पार्टियों में हैं जिसके कारण वे 'संकटमोचक' के तौर पर उभरते हैं।

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ये लेख दैनिक भास्कर के लिए है और 21 अगस्त के अंक में प्रकाशित है

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