नवाज के वश में नहीं है जिया के अवैध संतानों से जूझ पाना(10/10/16)
नवाज के आंतकवादियों पर रोक लगाने के निर्देश से पाक सेना की बढ़ी बेचैनी
आलोक कुमार
नई दिल्ली। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी इज्जत बचाने की कवायद तेज करनी पड़ रही है। इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान सेना के अधिकारियों को आतंकवाद के जरिए भारत के खिलाफ परोक्ष युद्ध जारी रखने मुश्किल का जिक्र किया है। इससे पाकिस्तान की अंदरुनी राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहा है। पाकिस्तान सेना बैकफुट पर आ गई है। पाकिस्तान सेना प्रमुख राहिल शरीफ नवंबर में सेवानिवृत हो रहे हैं।
सर्जिकल स्ट्राइक से पहले पनामा पेपर लीक के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाकिस्तान सेना के आगे लगभग सरेंडर कर दिया था। सैन्य बगावत की आशंका में उन्होंने ज्यादातर वक्त लाहौर में बिताना शुरु कर रखा था लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक की आलोचना ने पाकिस्तान के लिए राजनीतिक जरुरत को महत्वपूर्ण बना दिया है। माना जा रहा है कि इस महत्व को बरकरार रखने के लिए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ खड़ा करने के पुराने मुहिम को फिर से तराशने की मुद्रा में आ गए हैं। हालांकि इसे लेकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख राहिल शरीफ के बीच खींचतान शुरु हो गई है। सेना प्रमुख से यह तनातनी खतरनाक मोड़ तक नहीं पहुंचे इसके लिए कहा जा रहा है कि रिटार्यड हो रहे जनरल राहिल शरीफ को फील्ड मार्शल का दर्जा दे दिया जाए और उनकी जगह कोई नया सैन्य प्रमुख चुना जाए।
प्रधानमंत्री नवाज शरीफ नए सैन्य प्रमुख के चयन में इस बार खास सावधानी बरत रहे हैं। वह पिछली बार परवेज मुशर्रफ को ताकतवर बनाकर हुए नुकसान को झेल चुके हैं।
कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के विदेश सचिव एजाज चौधरी की ओर से संयुक्त राष्ट्र संघ में बुरहान बानी के प्रोजेक्शन की बनाई गई प्रेजेंटेशन टांय टांय फिस्स हो गई है। कश्मीर में मानवाधिकार हनन का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई कमाल नहीं दिखा सका। इसपर जहां भारत के जवाब को वाहवाही मिली वहीं पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल से मिलने के लिए कोई भी देश तैयार नहीं हुआ। इससे नवाज शरीफ के पुराने रुख को बल मिला है।
शरीफ को शुरु से लगता रहा है कि आतंकवाद के जरिए परोक्ष युद्ध चलाना आसान नहीं है। गुप्त ऑपरेशन और हिंसा के साजिश से कश्मीर मसले का हल मुमकिन नहीं है। लेकिन पनामा पेपर लीक के बाद से नवाज असुरक्षित महसूस करने लगे। सेना द्वारा तख्तापलट के डर से उन्होंने अपना ज्यादा वक्त लाहौर में बिताना शुरू कर दिया। इस दौरान वो सेना के हाथ की कठपुतली बन गए। और नतीजा रहा कि सेना की मदद से उड़ी जैसे हमले को अंजाम दिया गया। पठानकोट हमले की पाकिस्तान में चल रही जांच को शिथिल कर दिया गया और दोनों देशों के बीच कायम दोस्ताना संबंध को बलि बेदी पर चढा दिया गया।
पनामा पेपर लीक से प्रधानमंत्री शरीफ हुई बदनामी के बाद सेना ने सरकार को सीधा संदेश दे दिया था कि या तो वो सेना के लाइन पर आ जाए या तख्तापलट के लिए तैयार रहें। ब्लैक मनी का हेवेन कहे जाने वाले पनामा के अकाउंट्स में नवाज के बेटे और बेटी का नाम मौजूद खातों का जिक्र है। पनामा पेपर लीक ने जम्हूरियत के हिमायती प्रधानमंत्री को सेना के अधीन काम करना स्वीकार कर लिया। इसी दौरान उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में सेना ने ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब की। उसकी सफलता ने पाकिस्तानी सेना का हौसला बढ़ा दिए । उसकी हिम्मत चीन के साथ बनने जा रहे इकॉनोमिक कॉरिडोर से भी काफी बढ़ गई। क्योंकि सेना पर प्रांतीय सरकारों के बजाए इकॉनोमिक कॉरिडोर को सुरक्षित रखने की पूरी जिम्मेदारी आ गई है।
लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक से बदली परस्थिति में पाकिस्तान के मौजूदा हालात बिल्कुल बदल गए हैं। वहां की राजनीति बड़े बदलाव से गुजर रही है । प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार इस मौके का फायदा उठाकर ये प्रचार करने में लगी है कि कैसे सेना द्वारा आतंक को समर्थन करने से आज पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग पड़ता जा रहा है।
कूटनीति के जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान में नए सेना प्रमुख के नाम की घोषणा के बाद स्थितियों में बड़ा बदलाव आएगा। दरसल राहील शरीफ नवंबर में रिटायर हो रहे है। उन्होंने अपने कार्यकाल को बढ़ाए जाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई हैष लेकिन अगर वो पाकिस्तानी सेना को इस दौरान और ऐसे हालात में छोड़कर जाते हैं तो इससे पाकिस्तानी सेना बड़ी मुश्किल में पड़ सकती है। संभावना जताई जा रहा है कि उनका प्रमोशन करके उन्हें फील्ड मार्शल बनाया जा सकता है। परवेज मुशर्रफ के साथ हुए कड़वे अनुभवों की वजह से इस बार नवाज शरीफ अगला सेना प्रमुख अपनी पसंद से नियुक्त करना चाहते हैं।
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